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मध्य सप्तकाचे चिंतन 47 4.11.26

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 डायस खातीर केस करप हो उजवाडाचो उत्सव मालिनी शंकर हांणी केला डिजिटल प्रवचन दिवाळी कोनशाक लागीं पावल्या आनी पर्यावरणवादींच्या आवाहनांक लागून भारतांतलें वातावरण वायूच्या उत्सर्जनाक भियेता ताचे परस चड विखारी जावपाक लागलां. दिवाळी हो उजवाडाचो उत्सव आसून वेपारी समाजांक नवें वर्स आसता आनी डायस्पोरांतले चडशे भारतीय उपखंड आनी दर्यादेगेवेले भारतीयूय उजवाडाचो उत्सव मनयतात. खरेंच तो भगवान रामाच्या राज्याभिशेकाचो निशाणो आसून ताणें रावण असुराचेर जैत मेळयलें, जांणी आपल्या 14 वर्सांच्या राजनिर्वासनांत वा भारतीय पुराणकथांनी वळखतात ते प्रमाण वनवासांत आपली बायल सीतादेवीक अपहरण केल्ली. पूण आयज दिवाळी वायटाचेर बऱ्याचें जैत मेळोवपाखातीर उजवाडाचो उत्सव म्हणून मनयतात अशें कठीण. आयज ते विखारी रसायनांपसून तयार केल्ले साखळी बॉम्ब, प्रदुशण करपी दिवे आशिल्ले आवाज करपी फटाके, “लायटीच्या उत्सवाचें” प्रतीक कठीण. ताची फकत विखारी हवेची न्हय... सुकण्यांच्या घोंटेरांतल्या पिलांक अडचणी हाडपी दिवे विचारात. पावसा उपरांत सगळ्या सुकण्यांनी एक तर तांतयां घाल्यांत वा पिलां घोंटेरांतल्यान भायर सरल्यांत.... ह्या प्राण्यांक प...

मिडवीक म्युझिंग्स ४७ (४.११.२६)

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 प्रकाशाच्या या उत्सवात 'दिव्यांचे' महत्त्व अधोरेखित करताना लेखिका: मालिनी शंकर डिजिटल चर्चा दिवाळी जवळ आली आहे, पण पर्यावरणवाद्यांच्या आवाहनांमुळे भारतातील वातावरण, मला वाटते, प्रदूषके उत्सर्जित करणाऱ्या फटाक्यांपेक्षाही अधिक 'विषारी' बनले आहे. दिवाळी हा प्रकाशाचा उत्सव आहे. व्यापारी समुदायांसाठी हा नवीन वर्षाची सुरुवात मानला जातो. भारतीय उपखंडातील लोकच नव्हे, तर परदेशात स्थायिक झालेले भारतीयही हा प्रकाशाचा उत्सव मोठ्या उत्साहात साजरा करतात. भारतीय पौराणिक कथांनुसार, प्रभू श्रीरामांनी रावणाचा पराभव करून, आपली पत्नी सीतेची सुटका केली आणि त्यानंतर त्यांचा राज्याभिषेक झाला; याच घटनेच्या स्मरणार्थ हा उत्सव साजरा केला जातो. परंतु, आजच्या काळात दिवाळी केवळ 'प्रकाशाचा उत्सव' किंवा 'वाईटावर चांगल्याचा विजय' दर्शवणारा सण म्हणून साजरी केली जात नाही. आजच्या दिवाळीत विषारी रसायनांपासून बनवलेले फटाक्यांचे लांब लचक हार आणि कानठळ्या बसवणारे, प्रदूषण पसरवणारे फटाके अधिक दिसतात. हे कशाच्याही दृष्टीने 'प्रकाशाचा उत्सव' म्हणता येणार नाही. केवळ हवाच प्रदूषित होते अ...

મિડવીક મ્યુઝિંગ્સ (સાપ્તાહિક ચિંતન) ૪૭ - ૪.૧૧.૨૬

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 પ્રકાશના આ પર્વ પર દીવાઓનું સમર્થન લેખક: માલિની શંકર ડિજિટલ ચિંતન દિવાળી નજીક આવી રહી છે, અને પર્યાવરણવાદીઓની અપીલોને કારણે ભારતમાં વાતાવરણ, મને ડર છે કે, હાનિકારક વાયુઓના ઉત્સર્જન કરતાં પણ વધુ ઝેરી બની રહ્યું છે. દિવાળી એ પ્રકાશનો તહેવાર છે. તે વેપારી સમુદાયો માટે નવા વર્ષની શરૂઆતનું પ્રતીક છે. ભારતીય ઉપખંડના મોટા ભાગના લોકો અને વિદેશમાં વસતા ભારતીયો પણ આ પ્રકાશ પર્વની ઉજવણી કરે છે. છેવટે, આ તહેવાર ભગવાન રામના રાજ્યાભિષેકનું સૂચક છે, જે તેમણે અસુર રાવણ પર વિજય મેળવ્યા બાદ કર્યો હતો. રાવણે ભગવાન રામના ૧૪ વર્ષના વનવાસ દરમિયાન તેમની પત્ની સીતાદેવીનું અપહરણ કર્યું હતું. પરંતુ આજે, દિવાળી ભાગ્યે જ 'પ્રકાશના પર્વ' તરીકે કે 'અધર્મ પર ધર્મના (અથવા અનિષ્ટ પર સારાના) વિજય' તરીકે ઉજવાય છે. આજે તો ઝેરી રસાયણોમાંથી બનેલા લડીબંધ ફટાકડા અને પ્રદૂષણ ફેલાવતા પ્રકાશવાળા ઘોંઘાટિયા ફટાકડાનો જ બોલબાલા છે, જે 'પ્રકાશના પર્વ'નું પ્રતીક તો જરાય નથી. વાત માત્ર પ્રદૂષિત હવા સુધી સીમિત નથી... જરા એવા પ્રકાશ વિશે વિચારો જે પક્ષીઓના માળામાં રહેલા તેમના બચ્ચાઓને ખલેલ પહોંચાડે છે. ચોમાસા પછ...

ਮਿਡਵੀਕ ਮਿਊਜ਼ਿੰਗਜ਼ (Midweek Musings) 47 - 4.11.26

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 ਰੌਸ਼ਨੀਆਂ ਦੇ ਇਸ ਤਿਉਹਾਰ 'ਤੇ ਦੀਵਿਆਂ ਦੀ ਮਹੱਤਤਾ ਲੇਖਕ: ਮਾਲਿਨੀ ਸ਼ੰਕਰ ਡਿਜੀਟਲ ਚਰਚਾ ਦੀਵਾਲੀ ਨੇੜੇ ਆ ਰਹੀ ਹੈ, ਅਤੇ ਮੈਨੂੰ ਡਰ ਹੈ ਕਿ ਵਾਤਾਵਰਣ ਪ੍ਰੇਮੀਆਂ ਦੀਆਂ ਅਪੀਲਾਂ ਭਾਰਤ ਦੇ ਵਾਤਾਵਰਣ ਨੂੰ ਹਾਨੀਕਾਰਕ ਗੈਸਾਂ ਨਾਲੋਂ ਵੀ ਵੱਧ ਜ਼ਹਿਰੀਲਾ ਬਣਾ ਰਹੀਆਂ ਹਨ। ਦੀਵਾਲੀ ਰੌਸ਼ਨੀਆਂ ਦਾ ਤਿਉਹਾਰ ਹੈ। ਵਪਾਰਕ ਭਾਈਚਾਰਿਆਂ ਲਈ ਇਹ ਨਵੇਂ ਸਾਲ ਦੀ ਸ਼ੁਰੂਆਤ ਦਾ ਪ੍ਰਤੀਕ ਹੈ। ਭਾਰਤੀ ਉਪ-ਮਹਾਂਦੀਪ ਦੇ ਨਾਲ-ਨਾਲ ਵਿਦੇਸ਼ਾਂ ਵਿੱਚ ਵਸੇ ਭਾਰਤੀ ਵੀ ਇਸ ਤਿਉਹਾਰ ਨੂੰ ਬੜੇ ਉਤਸ਼ਾਹ ਨਾਲ ਮਨਾਉਂਦੇ ਹਨ। ਦਰਅਸਲ, ਇਹ ਤਿਉਹਾਰ ਭਗਵਾਨ ਰਾਮ ਦੇ ਰਾਜ-ਤਿਲਕ ਦੀ ਯਾਦ ਦਿਵਾਉਂਦਾ ਹੈ, ਜੋ ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੂੰ ਅਸੁਰ ਰਾਵਣ 'ਤੇ ਜਿੱਤ ਪ੍ਰਾਪਤ ਕਰਨ ਤੋਂ ਬਾਅਦ ਮਿਲਿਆ ਸੀ। ਰਾਵਣ ਨੇ ਭਗਵਾਨ ਰਾਮ ਦੇ 14 ਸਾਲਾਂ ਦੇ 'ਬਨਵਾਸ' (ਜਲਾਵਤਨੀ) ਦੌਰਾਨ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੀ ਪਤਨੀ ਸੀਤਾ ਦੇਵੀ ਦਾ ਅਗਵਾ ਕਰ ਲਿਆ ਸੀ। ਪਰ ਅੱਜ, ਦੀਵਾਲੀ ਨੂੰ 'ਰੌਸ਼ਨੀਆਂ ਦੇ ਤਿਉਹਾਰ' ਵਜੋਂ ਜਾਂ 'ਬੁਰਾਈ 'ਤੇ ਚੰਗਿਆਈ ਦੀ ਜਿੱਤ' ਦੇ ਪ੍ਰਤੀਕ ਵਜੋਂ ਬਹੁਤ ਘੱਟ ਮਨਾਇਆ ਜਾਂਦਾ ਹੈ। ਅੱਜ-ਕੱਲ੍ਹ ਇਸ ਵਿੱਚ ਜ਼ਹਿਰੀਲੇ ਰਸਾਇਣਾਂ ਨਾਲ ਬਣੇ ਲੜੀਵਾਰ ਪਟਾਕੇ ਅਤੇ ਪ੍ਰਦੂਸ਼ਣ ਫੈਲਾਉਣ ਵਾਲੀ ਰੌਸ਼ਨੀ ਪੈਦਾ ਕਰਨ ਵਾਲੇ ਸ਼ੋਰ-ਸ਼ਰਾਬੇ ਵਾਲੇ ਪਟਾਕੇ ਸ਼ਾਮਲ ਹੋ ਗਏ ਹਨ, ਜੋ ਕਿ 'ਰੌਸ਼ਨੀਆਂ ਦੇ ਤਿਉਹਾਰ' ਦੇ ਅਸਲ ਅਰਥਾਂ ਨਾਲ ਮੇਲ ਨਹੀਂ ਖਾਂਦੇ। ਇਹ ਸਿਰਫ਼ ਹਵਾ ਨੂੰ ਜ...

साप्ताहिक चिन्तन ४७ | ४.११.२६

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 प्रकाशको पर्वमा 'दियो' (बत्ती) को महत्त्वबारे एक विमर्श लेखक: मालिनी शंकर डिजिटल विमर्श दिवाली नजिकिँदै छ। मलाई डर छ, पर्यावरणविद्हरूका आह्वानले भारतको वातावरणलाई त्यहाँ हुने हानिकारक ग्यास उत्सर्जनभन्दा पनि बढी विषाक्त बनाउँदै लगेको छ। दिवाली प्रकाशको पर्व हो। यसले व्यापारी समुदायका लागि नयाँ वर्षको सुरुवातलाई जनाउँछ। भारतीय उपमहाद्वीपका अधिकांश मानिसहरूका साथै विदेशमा बसोबास गर्ने भारतीय मूलका मानिसहरू (डायस्पोरा) पनि यो पर्व मनाउँछन्। पौराणिक कथाअनुसार, भगवान् रामले असुर रावणमाथि विजय प्राप्त गरेपछि उहाँको राज्याभिषेक भएको दिनको सम्झनामा यो पर्व मनाइन्छ। रावणले रामको १४ वर्षे वनवासका क्रममा उनकी पत्नी सीतादेवीलाई अपहरण गरेका थिए। तर आज, दिवालीलाई 'असलको खराबमाथि विजय' जनाउने प्रकाशको पर्वका रूपमा मनाइने चलन लगभग हराइसकेको छ। अहिले त यो पर्व विषाक्त रसायनले बनेका लामो लडी (chain bombs) र प्रदूषण फैलाउने उज्यालो दिने चर्को आवाज आउने पटाकाहरूमा सीमित भएको छ—जुन कुनै पनि अर्थमा 'प्रकाशको पर्व' को प्रतीक होइन। यहाँ कुरा केवल प्रदूषित हावाको मात्र छैन; ती उज्याला ...

মিডৱিক মিউজিংছ ৪৭ ৪.১১.২৬

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 ডায়েছৰ বাবে কেছ বনাই এই পোহৰৰ উৎসৱ মালিনী শংকৰৰ দ্বাৰা ডিজিটেল ডিচকোৰ্চ দীপাৱলী ওচৰ চাপি আহিছে, আৰু পৰিৱেশবিদসকলৰ আবেদনে ভাৰতৰ বায়ুমণ্ডলক গেছীয় নিৰ্গমনক ভয় কৰাতকৈ অধিক বিষাক্ত কৰি তুলিছে। দীপাৱলী পোহৰৰ উৎসৱ আৰু ব্যৱসায়ী সম্প্ৰদায়ৰ বাবে নতুন বছৰ আৰু প্ৰব্ৰজনকাৰী ভাৰতীয় উপমহাদেশ আৰু সাগৰৰ পাৰৰ ভাৰতীয়সকলৰ অধিকাংশইও পোহৰৰ উৎসৱ উদযাপন কৰে। কাৰণ ই ৰাৱন্ন অসুৰৰ জয়ৰ পিছত ভগৱান ৰামৰ ৰাজ অভিষেক ঘটায় যিয়ে তেওঁৰ ১৪ বছৰীয়া ৰাজকীয় নিৰ্বাসনৰ সময়ত পত্নী সীতাদেৱীক অপহৰণ কৰিছিল বা ভাৰতীয় পৌৰাণিক কাহিনীত জনাজাত ভানভাছ। কিন্তু আজি দীপাৱলীক অশুভৰ ওপৰত ভালৰ জয়ৰ উপলক্ষে পোহৰৰ উৎসৱ হিচাপে পালন কৰা নহয়। আজি ই বিষাক্ত ৰাসায়নিক পদাৰ্থৰে নিৰ্মিত শৃংখলাবদ্ধ বোমা, প্ৰদূষণকাৰী লাইটৰ সৈতে কোলাহলপূৰ্ণ ক্ৰেকাৰ, “লাইটৰ উৎসৱ”ৰ প্ৰতীক প্ৰায়েই নহয়। ইয়াৰ কেৱল বিষাক্ত বতাহ নহয়... চৰাইৰ বাহত থকা পোৱালিবোৰক বিৰক্ত কৰা পোহৰবোৰৰ কথা ভাবি চাওক। বাৰিষাৰ পিছৰ সকলো চৰাইয়ে হয় কণী পাৰে বা ফুটা পোৱালিবোৰ বাহৰ পৰা ওলাই আহিছে.... এই জীৱবোৰে পৃথিৱী গ্ৰহটোও ভাগ কৰে, ই কেৱল মানৱতাৰ উত্তৰাধিকাৰী সূত্ৰে পোৱা সম্পত...

সপ্তাহের মাঝের ভাবনা ৪৭ | ৪.১১.২৬

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 আলোর উৎসবে প্রদীপের পক্ষে একটি যুক্তি মালিনী শঙ্কর ডিজিটাল আলোচনা দীপাবলি দোরগোড়ায়। তবে পরিবেশবাদীদের নানা আহ্বানের জেরে ভারতের পরিবেশ এখন যেন বিষাক্ত গ্যাসীয় নিঃসরণের চেয়েও বেশি দূষিত হয়ে উঠেছে বলে আমার মনে হয়। দীপাবলি হলো আলোর উৎসব। এটি ব্যবসায়ী সম্প্রদায়ের জন্য নতুন বছরের সূচনা নির্দেশ করে। ভারতীয় উপমহাদেশের অধিকাংশ মানুষ, এমনকি বিদেশে বসবাসরত ভারতীয়রাও এই উৎসব পালন করেন। পৌরাণিক কাহিনি অনুযায়ী, রাবণ কর্তৃক সীতাকে অপহরণের পর, ১৪ বছরের বনবাস শেষে রাবণের ওপর বিজয় লাভ করে ভগবান রামচন্দ্র যখন অযোধ্যায় ফিরে আসেন এবং রাজ্যাভিষিক্ত হন, সেই ঘটনাকে কেন্দ্র করেই এই উৎসবের উদ্ভব। কিন্তু আজকের দিনে দীপাবলি কি আর কেবল অশুভ শক্তির বিনাশ ঘটিয়ে শুভ শক্তির জয়ের প্রতীক হিসেবে পালিত হয়? এখন তো চারদিকে বিষাক্ত রাসায়নিক উপাদানে তৈরি চেইন-বোমা আর বিকট শব্দ ও দূষণ সৃষ্টিকারী আতশবাজির ছড়াছড়ি—এগুলোকে কি আর কোনোভাবেই ‘আলোর উৎসব’ বলা চলে? শুধু যে বাতাস বিষাক্ত হচ্ছে তা-ই নয়, এই কৃত্রিম আলো পাখির বাসায় থাকা ছানাদেরও ভীষণভাবে বিরক্ত করে। বর্ষা পরবর্তী সময়ে পাখিরা ডিম পাড়ে অথবা তাদের ছানারা বাসা থেকে বেরিয়ে...